पिथौरागढ़। सीमांत जनपद पिथौरागढ़ की समृद्ध लोक संस्कृति में सातूं-आठूं पर्व का अपना विशेष महत्व है। इसी परंपरा को जीवंत बनाए रखने का काम सतगढ़, खतेड़ा और मझेड़ा—तीनों तोकों की साझा आठूं लंबे समय से करती आ रही है। यहां आठूं पर्व केवल गौरा-महेश्वर की पूजा और विदाई तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ जुड़ी मां महाकाली की अनूठी लोकपरंपरा आज भी लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।

पूर्व ग्राम प्रधान कैलाश चंद्र कपड़ी बताते हैं कि सतगढ़ क्षेत्र में महाकाली के मंचन की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। पहले महाकाली का मंचन केवल सातूं के दिन रात में किया जाता था, लेकिन करीब 40-45 वर्षों से आठूं के दिन दिन में भी महाकाली का मंचन होने लगा है। समय के साथ इस परंपरा का स्वरूप और व्यापक हुआ और अब दूर-दराज से भी लोग इसे देखने पहुंचते हैं।

महाकाली मंचन की अपनी एक विशिष्ट परंपरा है। इसके लिए पहले से पात्र निर्धारित किया जाता है। हालांकि विशेष परिस्थितियों में यदि निर्धारित व्यक्ति शुद्धि-अशुद्धि अथवा किसी अन्य कारण से महाकाली का पात्र निभाने की स्थिति में न हो, तो परंपरा के अनुसार किसी दूसरे व्यक्ति को महाकाली का स्वरूप धारण कराया जा सकता है।

मंचन के दौरान महाकाली का रूप केवल एक अभिनय नहीं माना जाता, बल्कि इसे श्रद्धा और आस्था से जोड़ा जाता है। यही कारण है कि मंचन देखने पहुंचे श्रद्धालु इसे देवी के दर्शन और आशीर्वाद से जोड़कर देखते हैं।

सतगढ़ की आठूं की सबसे बड़ी विशेषता इसका साझा आयोजन है। खतेड़ा, मझेड़ा और बाटा सतगढ़—तीनों तोकों की गौरा एक साथ बाटा काशिन में मिलती हैं। इसके बाद ढोल-नगाड़ों और देव डांगरों के साथ पारंपरिक धार्मिक यात्रा आगे बढ़ती है और सभी लोग कालसिन मंदिर पहुंचते हैं।

बाटा काशिन में गौरा-महेश्वर के विसर्जन के बाद परंपरागत रूप से चुरमल मंदिर में देव डांगरों द्वारा फल बांटे जाते हैं। यह पूरी प्रक्रिया लोक आस्था, सामूहिकता और सदियों पुरानी ग्रामीण संस्कृति की जीवंत झलक प्रस्तुत करती है।

सतगढ़ की परंपरा की एक और खास बात है कि यहां आठूं के दिन ही गौरा की विदाई कर दी जाती है। जबकि कई अन्य गांवों में गौरा-महेश्वर की विदाई आठूं के तीन-चार दिन बाद तक की जाती है।

कपड़ी जी बताते हैं कि अन्य स्थानों पर चादर में फल रखकर उन्हें उछालने की परंपरा भी देखने को मिलती है, जबकि सतगढ़ में चुरमल मंदिर में देव डांगरों द्वारा फल बांटे जाने की अपनी विशिष्ट परंपरा है।

पूर्व प्रधान कैलाश चंद्र कपड़ी के अनुसार आज जब पहाड़ के अनेक गांव धीरे-धीरे खाली होते जा रहे हैं और पुरानी परंपराओं को बचाए रखना चुनौती बनता जा रहा है, ऐसे समय में सतगढ़ की आठूं उम्मीद जगाती है। वे बताते हैं कि हर वर्ष आठूं में जुटने वाली भीड़ बढ़ती जा रही है। बड़ी संख्या में लोग अपने गांवों और क्षेत्र से बाहर रहने के बावजूद पर्व के अवसर पर वापस लौटते हैं। महाकाली का मंचन और गौरा-महेश्वर की परंपरा उन्हें अपनी जड़ों से जोड़ती है।

आज पहाड़ के कई गांवों में जहां कभी होने वाले पारंपरिक आयोजन धीरे-धीरे कमजोर पड़ रहे हैं, वहीं सतगढ़, खतेड़ा और मझेड़ा की साझा आठूं ने इस सांस्कृतिक विरासत को अब भी मजबूती से थाम रखा है। सातूं-आठूं केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि पहाड़ के सामाजिक जीवन, लोकविश्वास और सामूहिकता का प्रतीक भी है। महाकाली का मंचन इस परंपरा में लोकनाट्य और आस्था का ऐसा संगम प्रस्तुत करता है, जो नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जोड़ने का काम करता है।

सतगढ़ की आठूं इस बात की मिसाल है कि यदि गांव के लोग मिलकर अपनी परंपराओं को आगे बढ़ाने का संकल्प लें, तो बदलते समय और पलायन के बीच भी लोक संस्कृति को जीवंत रखा जा सकता है। साझा आस्था, महाकाली का जीवंत मंचन, गौरा की पारंपरिक विदाई और देव डांगरों की मौजूदगी—सतगढ़ की आठूं को एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान देती है। _ कपिल भट्ट वाणी न्यूज़