पिथौरागढ़। देश की आजादी के लिए मात्र 18 वर्ष की आयु में फांसी के फंदे को हंसते-हंसते चूमने वाले अमर क्रांतिकारी खुदीराम बोस की शहादत को याद करते हुए पिथौरागढ़ के बस्ते में श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में शहीद खुदीराम बोस के साहस, त्याग और देशभक्ति को याद करते हुए उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किए गए।
कार्यक्रम में डा. तारा सिंह ने खुदीराम बोस के जीवन और क्रांतिकारी संघर्ष को याद करते हुए कहा कि ब्रिटिश शासन के अत्याचारी अधिकारी किंग्सफोर्ड को निशाना बनाने का बीड़ा खुदीराम बोस और उनके साथी प्रफुल्ल चाकी ने उठाया था। किंग्सफोर्ड का तबादला बंगाल से मुजफ्फरपुर किए जाने के बाद दोनों क्रांतिकारी वहां पहुंचे।
किंग्सफोर्ड को निशाना बनाकर किए गए बम हमले में दुर्भाग्यवश किंग्सफोर्ड बच गया, जबकि दो महिलाओं की मौत हो गई। घटना के बाद दोनों क्रांतिकारी वहां से निकल गए। खुदीराम बोस को बाद में पूसा रोड के पास गिरफ्तार कर लिया गया, जबकि उनके साथी प्रफुल्ल चाकी ने गिरफ्तारी से बचने के लिए आत्मबलिदान दिया।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि अंग्रेजी हुकूमत ने खुदीराम बोस को गिरफ्तार करने के बाद कठोर यातनाएं दीं, लेकिन इतनी कम उम्र में भी उनके हौसले को नहीं तोड़ सकी। अंततः 18 वर्ष की आयु में खुदीराम बोस को फांसी दे दी गई।
श्रद्धांजलि कार्यक्रम में सार्थक, बाबिता भट्ट, नारायण सिंह, सुनीता ओली, सौर्य मेहरा, प्रत्यक्ष, युवराज, दृष्टि तत्राड़ी, तेजस, परिणिता, अन्वी, गर्वित सहित कई लोग मौजूद रहे।
कार्यक्रम में शहीद खुदीराम बोस के बलिदान को याद करते हुए कहा गया कि देश की स्वतंत्रता के लिए अपना जीवन न्योछावर करने वाले ऐसे वीरों का योगदान सदैव देशवासियों के दिलों में जीवित रहेगा।
“हँसी-हँसी चढ़ गए फाँसी, देश के लिए मिट गए—शहीद खुदीराम बोस अमर रहें।”


