थल, पिथौरागढ़। पहाड़ों में बढ़ता मानव–वन्यजीव संघर्ष अब किसानों के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। थल क्षेत्र के अस्याली गांव में पिछले पांच दिनों से जंगली सूअरों के झुंड ने किसानों की रातों की नींद और महीनों की मेहनत दोनों छीन ली हैं। दिन में बंदरों के झुंड फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं, तो रात होते ही जंगली सूअर खेतों में घुसकर खड़ी फसल को तहस-नहस कर रहे हैं।

ग्रामीणों के अनुसार, जंगली सूअरों के झुंड ने 11 किसानों की करीब 60 नाली कृषि भूमि में खड़ी धान की फसल को बुरी तरह रौंदकर नष्ट कर दिया है। नुकसान झेलने वाले किसानों में सुरेश चंद रजवार, ललिता चंद, राजेंद्र सिंह, मीना देवी, करण सिंह, तुलसी देवी, गोविंद सिंह और जगदीश चंद समेत अन्य किसान शामिल हैं।

बालियां निकलने के समय उजड़ गई किसानों की उम्मीद किसानों का कहना है कि इस समय धान की फसल में बालियां निकल रही थीं और फसल तैयार होने की ओर बढ़ रही थी। ऐसे समय में रात के अंधेरे में जंगली सूअरों का झुंड खेतों में पहुंच रहा है और फसल को रौंदकर बर्बाद कर रहा है। एक ही रात में किसानों की कई महीनों की मेहनत पर पानी फिर जा रहा है।

फसल के लगातार नुकसान से किसानों में मायूसी और आक्रोश है। उनका कहना है कि खेतों की रखवाली करना अब बेहद मुश्किल हो गया है। दिन में बंदरों से फसल बचाने की चुनौती रहती है और रात में जंगली सूअरों के डर से खेतों की निगरानी करनी पड़ती है।

किसानों का सवाल—आखिर कब बनेगी ठोस नीति?

ग्रामीणों ने सरकार से प्रभावित खेतों का तत्काल स्थलीय निरीक्षण कर नुकसान का आकलन कराने और किसानों को उचित फसल मुआवजा देने की मांग की है। साथ ही उन्होंने बंदरों और जंगली सूअरों से फसलों की सुरक्षा के लिए स्थायी और प्रभावी व्यवस्था किए जाने की मांग उठाई है।

किसानों का कहना है कि पहाड़ों में मानव और वन्यजीवों के बीच टकराव लगातार बढ़ रहा है, लेकिन इससे निपटने के लिए अभी तक ऐसी ठोस नीति जमीन पर दिखाई नहीं दे रही है, जिससे किसानों को अपनी फसल और आजीविका की सुरक्षा मिल सके।

ग्रामीणों का कहना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले समय में किसान खेती से दूरी बनाने को मजबूर हो सकते हैं। ऐसे में सवाल सिर्फ एक गांव की फसल का नहीं, बल्कि पहाड़ में खेती और किसान के भविष्य का भी है। _ अनिल कार्की थल