पिथौरागढ़। सोर घाटी की लोक आस्था और सांस्कृतिक परंपराओं का प्रतीक मोस्टामानू मेला आज अपने मुख्य दिन पर पहुंच गया। ऋषि पंचमी के अवसर पर मोस्टामानू मंदिर परिसर में आयोजित मुख्य मेले में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। धार्मिक अनुष्ठानों के बीच लोकदेवता मोस्टामानू का देव डोला मंदिर परिसर में पहुंचा, जिसके दर्शन और आशीर्वाद के लिए श्रद्धालुओं में खासा उत्साह दिखाई दिया।
मुख्य मेले की शुरुआत पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों के साथ हुई। खुकदे के जागर के बाद देव डोला उठाया गया। मां भगवती का डोला आगे और उसके पीछे मोस्टामानू देवता का डोला श्रद्धालुओं के बीच निकला। भक्तों ने देव डोले के साथ मंदिर परिसर की परिक्रमा की। इस दौरान पूरा परिसर लोक आस्था और धार्मिक जयकारों से गूंज उठा।
परिक्रमा के बाद देव डोला जुलूस के रूप में मोस्टामानू देवता की धूनी के पास पहुंचा। यहां हवन और पूजा-अर्चना के साथ धार्मिक अनुष्ठान संपन्न किए गए। देव डंगरियों ने भी श्रद्धालुओं को आशीर्वाद दिया। देव डोले के आगमन और दर्शन के लिए सुबह से ही बड़ी संख्या में लोग मंदिर परिसर में जुटने लगे थे।
वर्षा के देवता के रूप में होती है विशेष मान्यता सोर घाटी में मोस्टामानू को वर्षा के देवता और प्रमुख लोकदेवता के रूप में पूजा जाता है। मान्यता है कि क्षेत्र में वर्षा की कमी होने पर मोस्टामानू की धूनी में हवन और पूजा-अर्चना करने से देवता प्रसन्न होते हैं और बारिश होती है। इसी लोकविश्वास के कारण मोस्टामानू की पूजा का सोर घाटी में विशेष महत्व है।
लोक मान्यता के अनुसार मोस्टामानू देवता बाईस प्रकार के वज्रों से सुसज्जित माने जाते हैं। ऋषि पंचमी के दिन देव डोले के दर्शन और आशीर्वाद को श्रद्धालु विशेष फलदायी मानते हैं।
देव डोले के साथ जीवंत हुई सदियों पुरानी परंपरा मोस्टामानू मेले का मुख्य आकर्षण हमेशा से देव डोला रहा है। आज जब देव डोला मंदिर परिसर में पहुंचा तो पुरानी धार्मिक परंपराएं एक बार फिर जीवंत होती दिखाई दीं। बुजुर्गों के लिए यह आयोजन पुरानी यादों को ताजा करने वाला रहा, वहीं नई पीढ़ी ने भी लोक परंपरा और देव संस्कृति को करीब से देखा।
कभी मोस्टामानू मेला पूरी सोर घाटी का प्रमुख लोकमेला हुआ करता था। दूर-दराज के गांवों से लोग पैदल चलकर यहां पहुंचते थे। समय के साथ मेले का स्वरूप बदला और अब यह धार्मिक आयोजन के साथ-साथ मनोरंजन, व्यापार तथा सरकारी योजनाओं की जानकारी का भी बड़ा मंच बन गया है।
झूले, दुकानें और सरकारी स्टॉल भी बने आकर्षण मुख्य मेले में धार्मिक आयोजनों के साथ बड़ी संख्या में दुकानें, झूले और विभिन्न प्रकार के स्टॉल भी लगाए गए हैं। मेले में पहुंचे लोगों ने खरीदारी के साथ मनोरंजन का भी आनंद लिया। विभिन्न सरकारी विभागों की ओर से लगाए गए स्टॉलों में कृषि, उद्यान, पशुपालन, शिक्षा और स्वास्थ्य सहित जनकल्याणकारी योजनाओं की जानकारी लोगों को दी जा रही है।
स्थानीय उत्पादों के स्टॉल भी मेले का आकर्षण बने हुए हैं। इससे स्थानीय कारीगरों और उत्पादकों को अपने उत्पादों के प्रचार-प्रसार और बिक्री का अवसर मिल रहा है।
आधुनिक स्वरूप के बीच कायम है देव आस्था वर्तमान में मोस्टामानू मेले को प्रशासन की ओर से छह दिवसीय महोत्सव का स्वरूप दिया गया है, लेकिन ऋषि पंचमी और देव डोले का दिन आज भी आयोजन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है।
आज देव डोले के आगमन के साथ मोस्टामानू मंदिर परिसर में सदियों पुरानी लोक आस्था और परंपरा का जीवंत दृश्य देखने को मिला। आधुनिकता के दौर में मेले का स्वरूप भले ही बदल गया हो, लेकिन मोस्टामानू की धूनी, मां भगवती की अगुवाई, देव डोला और श्रद्धालुओं की आस्था आज भी इस मेले की मूल पहचान बने हुए हैं। यही परंपराएं मोस्टामानू मेले को सोर घाटी की जीवंत लोक विरासत के रूप में पहचान दिलाती हैं। _ कपिल भट्ट वाणी न्यूज


