पिथौरागढ़। पहाड़ से पलायन रोकने और गांवों में रोजगार की नई संभावनाएं पैदा करने की बातें वर्षों से होती रही हैं। सरकारें किसानों की आय बढ़ाने, आधुनिक खेती और उद्यानिकी को बढ़ावा देने की योजनाएं भी चला रही हैं। उत्तराखंड सरकार ने भी किसानों की आय बढ़ाने और प्रत्येक विकासखंड में आदर्श कृषि एवं उद्यान गांव विकसित करने की दिशा में तीन वर्षीय कार्ययोजना बनाने के निर्देश दिए हैं।

लेकिन जब प्राकृतिक आपदा किसान की वर्षों की मेहनत को कुछ घंटों में खत्म कर देती है, तब उसके साथ खड़े होने की व्यवस्था कितनी मजबूत है? पिथौरागढ़ के ग्राम द्वलिसेरा, गंगेत निवासी किसान मन्नू धामी की कहानी इसी सवाल को सामने लाती है।

मन्नू धामी पिछले करीब छह वर्षों से गांव में आधुनिक बागवानी कर रहे हैं। उन्होंने अपनी मेहनत और करीब 15 लाख रुपये की निजी पूंजी लगाकर 1200 से अधिक देशी-विदेशी प्रजातियों के फलदार पौधे लगाए। लीची, बेर, केला, आंवला, आम, अनार, माल्टा समेत अनेक फलदार पौधों के साथ वह मछली पालन और मधुमक्खी पालन भी कर रहे थे।

मकसद केवल अपनी आमदनी बढ़ाना नहीं था। उनका प्रयास था कि पहाड़ में रहकर खेती-बागवानी को रोजगार का माध्यम बनाया जाए और दूसरे लोग भी गांव में रहकर कुछ नया करने के लिए प्रेरित हों।

लेकिन पिछले कुछ समय से मौसम लगातार उनके इस प्रयास की परीक्षा ले रहा है। मई-जून में हुई अतिवृष्टि से हुए नुकसान के बाद अब हाल की तेज बारिश, बादल फटने और ओलावृष्टि ने उनकी बागवानी को फिर बड़ा झटका दिया है। कई फलदार पेड़ क्षतिग्रस्त या पूरी तरह नष्ट हो गए।

मन्नू धामी बताते हैं कि उन्होंने छह साल तक जिस बाग को खड़ा करने के लिए मेहनत की, वह एक झटके में फिर शुरुआती स्थिति में पहुंच गया है।

“बहुत मेहनत से काम शुरू किया था। अपनी जेब से करीब 15 लाख रुपये लगाए। अब बारिश और ओलावृष्टि ने फिर से जीरो पर ला दिया। अगर सरकार मदद करे तो हम पहाड़ के गांवों को बागवानी के क्षेत्र में बहुत आगे ले जा सकते हैं।”

पटवारी ने किया मौका-मुआयना, लेकिन राहत का इंतजार मई-जून में हुई अतिवृष्टि के दौरान भी नुकसान के बाद राजस्व विभाग की ओर से मौका-मुआयना किया गया था। किसान का कहना है कि इसके बाद राहत राशि को लेकर अभी तक स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाई है।

वहीं वाणी न्यूज की ओर से उद्यान विभाग से जानकारी लेने पर सामने आया कि बागवानी के इस तरह के नुकसान के लिए सामान्य राहत व्यवस्था में मुआवजे का प्रावधान स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं बताया गया। ऐसे मामलों में यदि किसान ने संबंधित फसल का बीमा कराया हो और फसल बीमा योजना के दायरे में वह नुकसान आता हो, तो बीमा दावा संभव हो सकता है।

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का उद्देश्य प्राकृतिक आपदा से अधिसूचित फसल को हुए नुकसान की स्थिति में वित्तीय सहायता देना है। हालांकि योजना में कौन-सी फसल और क्षेत्र अधिसूचित है, यह महत्वपूर्ण है।

यहीं से एक बड़ा सवाल सामने आता है—क्या वर्षों की मेहनत से तैयार किए गए फलदार पेड़, बाग और मिश्रित कृषि व्यवस्था के लिए भी ऐसी सुरक्षा व्यवस्था नहीं होनी चाहिए, जो किसान को आपदा के बाद दोबारा खड़ा होने में मदद कर सके?

एक तरफ उद्यानिकी को बढ़ावा, दूसरी तरफ आपदा के बाद किसान अकेला?

उत्तराखंड में सरकार उद्यानिकी को ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार बनाने की बात कर रही है। पॉलीहाउस, कीवी, उच्च मूल्य वाली फसलों और अन्य उद्यानिकी गतिविधियों को बढ़ावा देने की योजनाएं भी सामने आई हैं।

सरकार की नई महक क्रांति नीति 2026-36 में भी पौधशाला विकास, खेती के लिए अनुदान, प्रशिक्षण, फसल बीमा तथा पैकेजिंग-ब्रांडिंग जैसी व्यवस्थाओं का उल्लेख किया गया है।

लेकिन मन्नू धामी जैसे किसानों की स्थिति यह सवाल पूछती है कि जब कोई किसान सरकारी प्रोत्साहन से आगे बढ़कर अपनी निजी पूंजी और वर्षों की मेहनत लगा देता है, तो प्राकृतिक आपदा में उसकी वर्षों पुरानी संपत्ति और तैयार बाग की सुरक्षा का क्या तंत्र है?

किसान के लिए एक फलदार पेड़ सिर्फ एक पौधा नहीं होता। उसे तैयार होने में वर्षों लगते हैं। फलदार बाग उजड़ने का अर्थ केवल उस वर्ष की फसल का नुकसान नहीं, बल्कि आने वाले कई वर्षों की संभावित आय का नुकसान भी है।

सरकार पहाड़ों में रिवर्स पलायन, स्वरोजगार और आधुनिक खेती को बढ़ावा देने की बात करती है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति गांव लौटकर अपनी पूंजी लगाता है, छह साल तक मेहनत करके बाग तैयार करता है और फिर प्राकृतिक आपदा में सब कुछ खो देता है, तो अगली बार वह दोबारा निवेश करने का जोखिम कैसे उठाएगा?

किसान से कहा जाता है कि गांव लौटिए, आधुनिक खेती कीजिए, बागवानी कीजिए और आत्मनिर्भर बनिए। लेकिन जब बादल फटता है, ओलावृष्टि होती है या अतिवृष्टि पूरी मेहनत बहा ले जाती है, तब किसान को दोबारा खड़ा करने के लिए व्यवस्था कितनी तैयार है ? यह सवाल केवल मन्नू धामी का नहीं, बल्कि उन तमाम पहाड़ी किसानों का है जो खेती-बागवानी में अपना भविष्य तलाश रहे हैं ।

मन्नू धामी की स्थिति एक व्यापक नीति की जरूरत की ओर इशारा करती है। किसानों के लिए ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिसमें प्राकृतिक आपदा के बाद मुआयना, नुकसान का वास्तविक आकलन, क्षतिग्रस्त पौधों और बागों का मूल्यांकन तथा पुनर्बहाली के लिए सहायता स्पष्ट प्रक्रिया के तहत हो।

भाजपा प्रवक्ता सुरेश जोशी भी हाल में बारिश के मौसम में किसानों को होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए सरकार से ठोस नीति बनाने की आवश्यकता को लेकर मुख्यमंत्री को पत्र लिख चुके हैं और सोशल मीडिया के माध्यम से भी यह मुद्दा उठाया है।

ऐसे में सवाल अब यह है कि क्या सरकार बागवानी और कृषि क्षेत्र के लिए ऐसी दीर्घकालिक आपदा-सुरक्षा नीति बनाएगी, जिससे प्राकृतिक आपदा के बाद किसान सिर्फ पंचनामा और आश्वासन के भरोसे न रहे, बल्कि उसे दोबारा खेती शुरू करने के लिए वास्तविक आर्थिक और तकनीकी मदद मिल सके?

मन्नू धामी के उजड़े बाग में सिर्फ टूटे हुए पेड़ नहीं हैं। वहां पहाड़ में रोजगार पैदा करने, पलायन रोकने और गांव को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने का एक सपना भी टूटा है।

अब देखना यह है कि यह सपना यहीं खत्म होता है या सरकार की मदद से मन्नू धामी फिर से अपनी जमीन पर नए पौधे लगाकर शुरुआत कर पाते हैं।

क्योंकि असली सवाल यही है—नुकसान के बाद किसान को सिर्फ राहत कैसे मिले, यह नहीं; उसे दोबारा खड़ा होने का हौसला और साधन कौन देगा ?

_ कपिल भट्ट वाणी न्यूज