पिथौरागढ़। सोरघाटी की समृद्ध लोकसंस्कृति और कृषि परंपरा का प्रतीक ऐतिहासिक कुमौड़ हिलजात्रा एक बार फिर लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए तैयार है। पिथौरागढ़ के कुमौड़ गांव में इस वर्ष 24 अगस्त 2026 को हिलजात्रा का आयोजन किया जाएगा। आयोजन को लेकर युवा कलाकार पारंपरिक मुखौटों को सजाने और पात्रों की तैयारियों में जुटे हैं।

हिलजात्रा केवल एक लोक उत्सव नहीं, बल्कि सोरघाटी के पारंपरिक कृषि और ग्रामीण जीवन की जीवंत झांकी है। कुमाऊं मंडल की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार इसका संबंध धान की रोपाई, बरसात के मौसम में होने वाले कृषि कार्य और ग्रामीण श्रम से है। यह परंपरा पश्चिमी नेपाल के महाकाली क्षेत्र से सोर घाटी तक पहुंची और कुमौड़ गांव में इसकी शुरुआत हुई।

मैदान में उतरेंगे ग्रामीण जीवन के पात्र हिलजात्रा के दौरान कुमौड़ के मैदान में एक-एक कर पारंपरिक पात्रों का प्रवेश होता है। गल्या बल्द, नेपाली हल, छोटी हल, हिरन-चीतल, किसान, घसियारी, शिकारी और अन्य पात्र मुखौटों और पारंपरिक वेशभूषा के साथ ग्रामीण जीवन की तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। बैलों की जोड़ी और किसान के बीच होने वाला स्वांग तथा महिलाओं द्वारा धान रोपाई का अभिनय दर्शकों को पहाड़ के पुराने कृषि जीवन से जोड़ देता है।

हुड़के की थाप, ढोल-दमाऊ की आवाज और लोकगीतों के बीच जब कलाकार मैदान में उतरते हैं तो पूरा माहौल लोक संस्कृति के रंग में रंग जाता है।

लखिया भूत के प्रवेश के साथ चरम पर पहुंचता है रोमांच हिलजात्रा का सबसे बड़ा आकर्षण लखिया भूत होता है। पारंपरिक विशाल मुखौटे, लाल-काली पोशाक, चंवर, रुद्राक्ष और घंटियों से सुसज्जित लखिया के मैदान में प्रवेश करते ही दर्शकों का उत्साह चरम पर पहुंच जाता है।

स्थानीय मान्यता में लखिया को भगवान शिव के गण से जोड़कर देखा जाता है। उसके आगमन के दौरान श्रद्धालु फूल और अक्षत अर्पित कर सुख-समृद्धि और अच्छी फसल की कामना करते हैं।

नेपाल से जुड़ी है हिलजात्रा की ऐतिहासिक कड़ी कुमौड़ की हिलजात्रा को करीब 500 वर्ष पुरानी परंपरा माना जाता है। प्रचलित मान्यता के अनुसार कुमौड़ के चार महर भाई नेपाल की प्रसिद्ध इंद्रजात्रा में शामिल होने गए थे। उनकी वीरता से प्रभावित होकर नेपाल नरेश ने उन्हें यश और समृद्धि के प्रतीक पारंपरिक मुखौटे प्रदान किए। इन्हीं मुखौटों के साथ कुमौड़ में हिलजात्रा की परंपरा आगे बढ़ी।

समय के साथ हिलजात्रा ने कई बदलाव देखे, लेकिन इसके मूल स्वरूप में आज भी कृषि, लोकविश्वास, वीरता और सामुदायिक सहभागिता की झलक दिखाई देती है।

नई पीढ़ी संभाल रही विरासत इस वर्ष भी युवा कलाकार पारंपरिक मुखौटों को तैयार करने और उन्हें रंग-रूप देने में जुटे हैं। यह तैयारी केवल एक आयोजन की तैयारी नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने का प्रयास है, जिसे कुमौड़ की कई पीढ़ियों ने संभालकर रखा है।

कुमौड़ की हिलजात्रा आज पिथौरागढ़ की पहचान बन चुकी है। आधुनिकता के दौर में भी जब ढोल-दमाऊ की थाप के बीच खेत, किसान, बैल और लोकदेवताओं से जुड़े पात्र मैदान में उतरते हैं, तो यह पर्व आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों और पहाड़ की पारंपरिक जीवनशैली से जोड़ने का संदेश देता है।

24 अगस्त को कुमौड़ का मैदान एक बार फिर उस ऐतिहासिक परंपरा का गवाह बनेगा, जहां लोककला, आस्था और कृषि संस्कृति एक साथ जीवंत होती दिखाई देगी।

Kapil Bhatt Vaninews