पिथौरागढ़। आधुनिकता के इस दौर में जहां सामूहिकता और पारंपरिक रीति-रिवाज धीरे-धीरे सीमित होते जा रहे हैं, वहीं पिथौरागढ़ जिले के कनालीछीना विकासखंड के बस्तड़ी-सिंगाली गांव में वर्षों पुरानी एक अनूठी परंपरा आज भी उसी जोश, उत्साह और श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है। इस परंपरा का नाम है ‘पाला’ यानी अपनी बारी। यह केवल भोजन और अन्य व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी बांटने का तरीका नहीं, बल्कि ग्रामीण एकता, सामाजिक सहभागिता, आध्यात्मिक आस्था और आपसी सहयोग की जीवंत मिसाल है।
बस्तड़ी-सिंगाली गांव में हर वर्ष शारदीय नवरात्र के दौरान कुछ ग्रामीणों को व्रत और पूजा-अर्चना के लिए चुना जाता है। इनकी संख्या तीन, पांच या इससे अधिक भी हो सकती है। चयनित व्रती पूरे नवरात्र मंदिर में रहकर पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। इस दौरान उनकी दिनचर्या श्रद्धा, संयम और साधना के इर्द-गिर्द रहती है।
व्रतधारियों की व्यवस्था सुचारु रूप से चलती रहे, इसके लिए गांव के सभी परिवार सामूहिक रूप से जिम्मेदारी निभाते हैं। खास बात यह है कि इस पूरी व्यवस्था को व्यवस्थित करने के लिए गांव में ‘पाला’ परंपरा का पालन किया जाता है।
‘पाला’ के अंतर्गत गांव के प्रत्येक परिवार की बारी तय होती है। जिस दिन जिस परिवार का पाला होता है, उस दिन मंदिर में रह रहे व्रतधारियों के लिए भोजन, दूध और अन्य आवश्यक व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी उसी परिवार की होती है। यह जिम्मेदारी अगले दिन सुबह के दूध की व्यवस्था तक निभाई जाती है।
इसके बाद अगले परिवार की बारी आती है और इसी तरह पूरे नवरात्र व्यवस्था निरंतर चलती रहती है। इस परंपरा के माध्यम से गांव का प्रत्येक परिवार धार्मिक आयोजन में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करता है। किसी एक परिवार पर पूरा भार नहीं पड़ता और सभी को सेवा करने का अवसर मिलता है।
बस्तड़ी-सिंगाली गांव की यह परंपरा बताती है कि ग्रामीण समाज में धार्मिक आयोजन केवल व्यक्तिगत आस्था तक सीमित नहीं रहे हैं, बल्कि वे सामाजिक संबंधों को मजबूत करने का माध्यम भी बने हैं। ‘पाला’ के जरिए ग्रामीणों में सेवा भाव, सहयोग, जिम्मेदारी और सामूहिक निर्णय की भावना बनी रहती है।
यह व्यवस्था नई पीढ़ी को भी सिखाती है कि गांव की परंपराएं केवल निभाने की चीज नहीं, बल्कि आपसी विश्वास और सामाजिक एकता को बनाए रखने का आधार हैं। यहां पूजा करने वाले व्रती भले ही मंदिर में साधना कर रहे हों, लेकिन उनके पीछे पूरा गांव सेवा और सहयोग की भावना से जुड़ा रहता है।
बदलते समय में बस्तड़ी-सिंगाली गांव की ‘पाला’ परंपरा लोक संस्कृति और सामुदायिक जीवन की उस भावना को जीवित रखे हुए है, जिसमें हर व्यक्ति स्वयं को समाज का अभिन्न हिस्सा मानता है। ईश्वर के प्रति श्रद्धा, धार्मिक अनुशासन और सामूहिक सहभागिता से जुड़ी यह परंपरा उत्तराखंड के ग्रामीण समाज की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को भी दर्शाती है।
अब सवाल आपसे है: क्या आपके गांव या क्षेत्र में भी नवरात्र अथवा अन्य धार्मिक आयोजनों के दौरान ‘पाला’, सामूहिक भंडारे, बारी-बारी से सेवा या इसी तरह की कोई अनूठी परंपरा निभाई जाती है?
यदि हां, तो अपने गांव का नाम, स्थान और परंपरा की जानकारी हमें जरूर भेजें, ताकि ऐसी लोक परंपराओं को जन-जन तक पहुंचाया जा सके और उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी के सामने लाया जा सके।


